नौ वर्ष पहले लापता बच्चे का मिला नर कंकाल, हत्यारोपी निकला भाई 

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जितेंद्र कुमार द्विवेदी

बांदा। जुर्म के दरख्त की जड़े इतनी मजबूत हो गई है कि प्रशासनिक तंत्र पुलिस विभाग द्वारा अभियोग पर की गई विवेचना पर सवालिया निशान लगना लाजमी होता है।  अपने कर्तव्यों का इमानदारी पूर्वक निर्वहन न करना लोकतंत्र में किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का हनन करना जैसा होता है। जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। मासूम की हत्या कर दरिंदे ने अपने ही आंगन में शव को दफना दिया था। घटना 9 वर्ष पूर्व जिले के थाना गिरवा अंतर्गत खुरहंड चौकी के सहेवा गांव की 9 अगस्त 2010 की है।

 

बताते चलें कि नौ वर्ष पूर्व बच्चे के नर कंकाल को पुलिस द्वारा उस समय पता लगा लिया जब हत्या अभियुक्त के भाई- भाई के विवाद में छोटे भाई ने अपहृत बच्चे के बारें में मां ने बताई। गिरवा थाना अंतर्गत 9 अगस्त 2010 को ग्राम सहेबा निवासी राजू मिश्रा द्वारा अपने 6 वर्ष के बेटे भोला मिश्रा की अपहरण होने की घटना की रिपोर्ट लिखाई थी। जिस पर पुलिस द्वारा विवेचना कर खानापूर्ति करते हुए निर्दोष अभियुक्तों पर चार्ज शीट लगाते हुए अपनी तरीके से पुलिसिया कार्रवाई संपन्न कर दी। 

9 साल बाद वास्तविकता ने पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। 12 अप्रैल 2019 को पीड़ित परिजनों द्वारा हत्या अभियुक्त के भाई द्वारा बताए जाने पर परिजनों ने पुलिस प्रशासन को सूचना दी। पुलिस द्वारा जब हत्या अभियुक्त रंगीलाल भुर्जी के घर के आंगन की खुदाई करवाई तो वहां से 6 वर्ष के बच्चे का नर कंकाल बरामद हुआ। इस घटना का खुलासा होने पर पुलिस की विवेचना तंत्र और जांच प्रणाली पर गंभीर आरोप और सवालिया निशान लगने लगे हैं। 


संवेदनहीन पशु प्रवृत्ति के उक्त दरिंदे ने दो थप्पड़ की वजह से 6 साल के मासूम की गला घोट कर हत्या कर दी थी। बताया जा रहा है कि हत्या अभियुक्त की मां द्वारा मृतक के पिता राजू मिश्रा को 9 वर्ष पहले हत्या अभियुक्त रंगीलाल भुर्जी के नाराज होने पर और बस द्वारा घर छोड़कर जा रहे रंगीलाल को राजू मिश्रा द्वारा बस से उतारकर मां को सौंपा गया था। इसी बीच समझाने को लेकर राजू मिश्रा द्वारा रंगीलाल को दो थप्पड़ मार दिए थे। क्या मालूम था इन दो थप्पड़ों मे उनके जिगर के टुकड़े का अंत हो जाएगा। इसी घटना से आक्रोशित रंगीलाल ने बदला लेने की ठान ली और राजू मिश्रा के घर में ना होने पर उनके 6 वर्ष के बेटे भोला को टॉफी की लालच देकर घर ले गया। यहां गला घोटकर निर्मम तरीके से हत्या कर दी और शव को अपने घर के आंगन में ही दफना दिया।

 

पुलिस की विवेचना रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय में भेजी गई चार्जशीट पर दोषी अभियुक्त को जो सजा मिली उनका क्या होगा? अपर पुलिस अधीक्षक एल. बी. के. पाल द्वारा बताया गया कि न्यायालय द्वारा उन लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया गया है। लेकिन पुलिस पर लग रहे जांच के नाम पर सवालिया निशान से संबंधित सवाल पर अपर पुलिस अधीक्षक ने यह टालते हुए कहा कि मामला आज से 9 -10 साल पूर्व का है। इसलिए गहनता से जांच के उपरांत ही कुछ कहा जा सकता है। जो भी हो पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ चुकी है। किस तरह निर्दोष लोगों को पुलिस जांच के बाद भी जेल पहुंचा देती है। सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि वास्तविकता का पता लगने पर क्या निर्दोषों के साथ भी न्याय होगा? क्या उनके द्वारा जेल में गुजारे गए दिन वापस मिलेंगे? जब ऐसी अकर्मण्यता और वास्तविकता से परे जांच और विवेचना होती रहेंगी तब  तक कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगते रहेंगे।

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