शिक्षा सत्र शुरू होते ही शिक्षा माफियाओ का धंधा हो गया है शुरू ! 

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कभी स्कूल पढ़ाने के लिए खोले जाते थे, अब मुनाफा कमाने के लिए। कोई रोक-टोक ही नहीं है। सुविधा के नाम पर पैसे लूट लेते हैं और फिर न सुविधाएं मिलती है और न ही पढ़ाई। फीस तो ठीक ही ठीक किताबें, यूनीफॉर्म तक में नहीं छोड़ते। हर साल स्कूल से पर्ची मिल जाती है। फलां दुकान से किताबें ले आना, फलां दुकान से यूनीफॉर्म। पैरेंट्स विरोध करने जाए कहां, निर्देश तो कागजी है। बच्चों को तो किसी न किसी स्कूल में पढ़ाना ही है। हर स्कूल के यही हाल है। खासकर सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में तो जैसी लूट मचा रखी है संचालकों ने। कोई बोलने-सुनने वाला ही नहीं है। स्कूली फीस पर नियामक बिठाने की बात हुई थी, लेकिन वह सिर्फ बात ही रह गई। हुआ कुछ नहीं। होगा भी नहीं। कौन अपनी कमाई छोडऩा चाहेगा। और तो और स्कूल संचालक, वह तो पैरेंट्स से कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। फिर चाहे वह कम्प्यूटर के नाम पर हो या मॉरल साइंस के नाम पर। 

उत्तर प्रदेश में नया शिक्षा सत्र शुरू होने के साथ ही अभिभावकों को अपनी जेब कटने की चिंता सताने लगी है। पहले भारी-भरकम फीस, फिर किताबों समेत पढ़ाई से जुड़े अन्य सामानों की कीमत का बोझ उनके कंधों पर आने वाला है। उधर, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के माता-पिता के सपने का स्कूल संचालक फायदा उठाने में लगे हुए हैं।

 आपको जानकर आश्चर्य होगा 

शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुसार, सीबीएसई स्कूल केवल एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की अनुमोदित पुस्तकों के प्रकाशकों को ही पाठयक्रम में शामिल कर सकते हैं। अन्य निजी स्कूल उत्तर प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम और उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग से अनुमोदित प्रकाशकों की किताबें लागू कर सकते हैं।  हर वर्ष निजी स्कूलों के संचालक नियम विरुद्ध बच्चों के बस्तों का बोझ बढ़ा देते हैं। इसमें ऐसी कई किताबें होती हैं, जो बच्चों के लिए उपयोगी नहीं होतीं, लेकिन कमीशन के चक्कर में इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाता है। इस तरह बच्चों के बस्ते का बोझ घटने की बजाय बढ़ रहा है।

सख्त कार्रवाई का प्रावधान

अधिनियम में इस तरह की मनमानी करने वाले निजी स्कूल संचालकों पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। समय रहते स्कूल संचालक नियमों का पालन नहीं करते, तो उन पर शिक्षा विभाग को नियमानुसार कार्रवाई का अधिकार है। संचालकों द्वारा तय दुकानों से किताबों की बिक्री होती है तो इसकी शिकायत मिलने पर स्कूल की मान्यता भी निरस्त करने का प्रावधान है। फिर चाहे वह स्कूल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड या फिर सीबीएसई पाठ्यक्रम का। यदि सूची को अनुमोदित नहीं कराया जाता है तो यह मान्य नहीं होगी।

नियम का पालन नहीं

हर साल देखने में यह आता है कि निजी स्कूल शिक्षा विभाग के निर्देशों को अनदेखा करते हैं। इससे पालकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। निजी स्कूल स्टेशनरी की दुकान का नाम बताकर किताबें खरीदने अभिभावकों को बाध्य करते हैं। बाजार में स्टेशनरी की दुकानों पर प्रिंट रेट पर ही किताबें दी जाती हैं, जिन्हें विवश होकर अभिभावकों को खरीदना पड़ता है। निजी स्कूलों और प्रकाशकों के मुनाफे के इस खेल में अभिभावक खुद को ठगा सा महसूस करता है। पालकों की मजबूरी हो जाती है कि उन्हें उसी दुकान से किताबें खरीदनी होती है। या कितनी फीस ली जाए, इस संबंध में कोई मानक तय नहीं किए गए हैं। 

निर्धारित दुकान से नहीं खरीदेंगे तब

स्कूल, एडमिशन के समय पैरेंट्स को बुक स्टोर्स और ड्रेस की दुकान का विजिटिंग कार्ड देता है। बुक डीलर्स और स्कूल मिलकर हर क्लास का ऐसा सेट तैयार करते हैं जो केवल निर्धारित बुक स्टोर्स पर मिल सके। डीलर्स भी शहर की दुकानों में सप्लाई करने में ये ध्यान रखते हैं कि जिस दुकान से कमीशन सेटिंग नहीं है, उसे किताब न मिल सके। सीबीएसई हर साल सिलेबस नहीं बदलती, लेकिन स्कूल संचालक एक ही क्लास की किताब हर साल बदलते हैं। प्रकाशक भी एक-दूसरे का बखूबी साथ देते हैं। सिलेबस वही रहता है लेकिन एक प्रकाशक की किताब में जो चेप्टर आगे रहता है, दूसरा उसे बीच में कर देता है। सवाल यह है कि क्या एक साल में ही प्रकाशक और किताबों का स्तर निम्न हो जाता है ?

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