पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाला विधेयक लोकसभा में पास

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भारत के समाचार/ India News
 

प्रस्तावित आयोग को दिये जा सकेंगे सिविल कोर्ट के समकक्ष अधिकार

नई दिल्ली। इलेक्शन मोड में आयी केंद्र की मोदी सरकार द्वारा संसद में पेश किया गया राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के संबंध में 123वां संविधान संशोधन विधेयक गुरूवार को लोकसभा से पास हो गया। सरकार की तरफ से बिल में कुछ संशोधन किए गए हैं जिसमें आयोग में महिला सदस्य को भी शामिल किया गया है साथ ही राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप को लेकर विपक्ष की शंका भी दूर करने की कोशिश की गई है।

गौरतलब है कि इस विधेयक को लेकर सरकार की तब किरकिरी हो गई थी जब पिछले वर्ष राज्य सभा में इस बिल पर विपक्ष का संशोधन पास हो गया था लिहाजा सरकार की तरफ से बिल में कुछ संशोधन कर इसे दोबारा संसद में पेश करना पड़ा।

 

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केंद्रीय सामिजक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत ने विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा कि एएमयू और जामिया में पिछड़ी जातियों का आरक्षण खत्म कर पिछली सरकार ने उसे अल्पसंख्यक दर्जा दिया लेकिन हमारी सरकार इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी एसटी और ओबीसी आरक्षण लेकर आने की पूरी कोशिश कर रही है।

केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलने के बाद यह आयोग सक्षम तरीके से समस्याओं का समाधान कर पाएगा उन्होंने कहा कि इस सदन से जो भी संशोधन के प्रस्ताव आए थे उन्हें मंजूर किया गया है। जाति के शामिल करने से संबंधित मामले राज्य सरकार की सिफारिश पर सुलझाए जा सकते हैं और राज्यों की सिफारिश रजिस्ट्रार,आयोग, कैबिनेट और फिर संसद की मंजूरी के बाद ही उस पर फैसला लिया जा सकता है।

लोकसभा में बिल पर चर्चा के दौरान बीजेडी सांसद भर्तृहरि महताब ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि अच्छी बात है कि सरकार ने महिला सदस्य की उनकी मांग को मान लिया है महताब ने कहा कि इस बिल में राज्यों को भी पावर मिलनी चाहिए। इस पर केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि यह कानून केंद्रीय सूची से संबंधित फैसले लेगा और इसमें केंद्र और राज्यों की सूचियां अलग-अलग हैं केंद्रीय सूची के विषय राज्यों के लिए बंधनकारी नहीं होंगे।

 

 

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गौरतलब है कि 1993 में गठित पिछड़ा वर्ग आयोग अभी तक सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ी जातियों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल करने या पहले से शामिल जातियों को सूची से बाहर करने का काम करता था।

इस विधेयक के पारित होने के बाद संवैधानिक दर्जा मिलने की वजह से संविधान में अनुच्छेद 342 (क) जोड़कर प्रस्तावित आयोग को सिविल न्यायालय के समकक्ष अधिकार दिये जा सकेंगे।

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