देश में भीड़तंत्र को कत्तई इजाजत नहीं: सुप्रीम कोर्ट 

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भारत के समाचार/ India News

 

संजय राजन

नई दिल्ली। आये दिन भीड़ की हिंसा को लेकर तरह—तरह के सवाल उठते रहे हैं। कभी गौरक्षा के नाम पर तो कभी चोरी के इल्जाम में भीड़ की पीटायी से मौत की खबरे, तो कभी धरना प्रदर्शन के नाम पर भीड़ का उग्र होना एक आम बात हो गयी है । आये दिन देखने को मिलती है कि  भीड़ के हिंसक रूप ने सामाजिक ताना बाना को कई बार तहस नहस किया हैं । मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो इस मामले में कोर्ट का रवैया ऐसी घटनाओं को लेकर काफी सख्त नजर आ रहा है ।

गोरक्षा के नाम पर हुई हिंसा के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन एस पूनावाला और महात्मा गांधी के पौत्र तुषार गांधी की तरफ से एक याचिका दायर की गयी,जिसपर सुनवायी करते हुये  चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने दो टूक कहा है कि भीडतंत्र की देश में किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती है ।इसपर रोक लगाने के लिये संसद को कानून बनाना चाहिये।

 

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 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांति और बहुलतावादी समाज की रक्षा करना हरेक राज्य सरकार का दायित्व है। साथ ही अदालत ने राज्य की सरकारों से कहा कि भीड़ की हिंसा को रोकना उसकी जिम्मेदारी है। भीड़ के हिंसक होने से  पीड़ितों के जान माल के नुकसान पर राज्य सरकार को  उचित मुआवजा देने का भी सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किया है ।

शीर्ष अदालत ने कहा कि 20 अगस्त को हम आगे की कार्रवाई पर समीक्षा करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि भीडतंत्र की भयानक गतिविधियों के नये कायदे कानून को पर हर हाल में रोक लगाया जाना चाहिये। भय और अराजकता का माहौल पैदा करने वालों के खिलाफ राज्य कार्रवाई करे। हिंसा की इजाजत किसी भी कीमत पर किसी को नहीं दी जा सकती है।

 

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एक आंकड़े के मुताबिक 2012 से लेकर अब तक गौरक्षा के नाम पर 85 ऐसी घटनायें हुयीं जिसमें भीड़ ने अब तक 33 लोंगों की जानें ले लीं । कई जगहों पर तो भीड़ के ऐसे करतूतों ने सांप्रदायिक दंगे तक का रूप अख्तियार कर लिया जिसका खामियाजा उस क्षेत्र के रहने वालों को तो भुगतना हीं पड़ा ,समाज में आपसी सौहार्द्र पर भी काफी बुरा असर डाला है । अब सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती के बाद संभवत राज्य सरकारों पर एक नैतिक दबाब तो जरुर देखने को मिलेगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है ।

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