... तो हॉट हाउस बन जाएगी पृथ्वी

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भारत के समाचार/ NATIONAL NEWS

 

नई दिल्ली।  हाल ही जारी एक अध्ययन के अनुसार, वैज्ञानिकों का कहना है कि भले ही वैश्विक जलवायु समझौते के तहत उत्सर्जन में कमी का लक्ष्य पूरा हो जाए लेकिन फिर भी दुनिया को हॉटहाउस स्थितियों में प्रवेश करने का खतरा है। जहां वैश्विक तापमान 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा। रिपोर्ट के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है तो यह एक व्यापक प्रभाव डालेगा, जिससे हॉटहाउस जैसी स्थितियां उत्पन्न होंगी और समुद्र के स्तर में वृद्धि हो जाएगी, इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर कुछ इलाके निवास करने योग्य नहीं रहेंगे।

 

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नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा प्रकाशित ‘ट्रैजेक्टोरिज ऑफ द अर्थ सिस्टम इन एंथ्रोपोसिन’ (trafectories of the earth system in the anthropocene) रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘हॉटहाउस’ तापमान पूर्व के औद्योगिक स्तर में 4 डिग्री सेल्सियस से 5 डिग्री सेल्सियस (7 से 9 फारेनहाइट) तक की वृद्धि कर सकता है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि दुनिया की जलवायु को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस के करीब सुरक्षित रूप से पहुंचाया जा सकता है या नहीं फिर कुछ ऐसी प्रक्रियाएं शुरु हो सकती हैं जो ग्लोबल वार्मिंग को और बढ़ा सकती हैं। वर्तमान में वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1 डिग्री सेल्सियस से अधिक है और प्रत्येक दशक में 0.17 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है।

 

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स्टॉकहोम रेसिलिएंस सेंटर (Stockholm Resilience Centre), कोपेनहेगन विश्विद्यालय, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (Australian National University) और पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च (Potsdam Institute for Climate Impact Research) के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह संभव है कि यदि कोई खतरे की सीमा पार हो जाए, तो कई टिपिंग पॉइंट्स (Tipping Points) में अचानक बदलाव आएगा। ऐसी प्रक्रियाओं में परमाफ्रॉस्ट थॉ, समुद्र तल से मीथेन हाइड्रेट्स का नुकसान, कमजोर भूमि और महासागर कार्बन सिंक, आर्कटिक की ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ का नुकसान और अंटार्कटिक समुद्री बर्फ और ध्रुवीय बर्फ की चादरों के विस्तार में कमी होना शामिल है।

 

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ये टिपिंग तत्व संभावित रुप से दूरगामी प्रभावों की एक पंक्ति की तरह कार्य कर सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के ‘हॉटहाउस’ बनने से रोकने वाली संभावनाओं को अधिकतम करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, बेहतर वन, कृषि और मृदा प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण तथा ऐसी प्रौद्योगिकियां जो वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाती हैं और इसे भूमिगत रूप से स्टोर करती है, की आवश्यकता है।

 

 

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