जब अटलजी अपने पिता के बने सहपाठी -- एक संस्मरण 

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नई दिल्ली। क्या कभी ऐसा हो सकता है कि कोई पिता पुत्र साथ साथ पढायी किये हों । शायद इस तरह का वाकया बहुत हीं रेयर होता हो लेकिन भारत रत्न अटल बिहारी के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया जब अटल जी अपने पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी के सहपाठी बने । जी हां हम बात कर रहे हैं कानपुर के डीएवी कालेज के उन दिनों की जब अटली जी और उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी ने एक साथ  कानून के पाठ्यक्रम में दाखिला लिया । कालेज प्रशासन ने अटलजी और उनके पिताजी के लिये एक हीं कमरा भी आवंटित किया । ये वो वक्त था जिसकी चर्चा अटलजी अपने करीबियों से बडे हीं दिलचस्प अंदाज में करते थे , अटलजी कहते थे साथ साथ कोर्स में दाखिला लेने से पिता और बेटे का रिश्ता दोस्ती में बदल गया । 

 

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अटलजी के जीवन की ये घटनायें ऐसी हैं जो उनके नहीं रहने के बाद बरबस याद आ रही हैं । आज अटल के जीवन से जुडे कई वाकये हैं जो याद आ रहे हैं । 1977 मे जनता सरकार में बतौर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना पहला भाषण हिन्दी में देकर लोगों का दिल जीत लिया । 

 

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लखनऊ से जुडी अटल की यादों को कालीचरण डिग्री कालेज ने भी संजोकर रखा है । कालेज में काव्यपाठ का आयोजन हुआ । अटल बिहारी वाजपेयी भी इस काव्यपाठ समारोह में शामिल हुये । मंच पर मौजूद अटलजी ने अपने जीवन का पहला काव्यपाठ इसी कालीचरण डिग्री कालेज में किया ,जिसके बाद एक कवि के रुप में अटलजी के व्यक्तित्व से सारे देश का परिचय हुआ ।

 

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साल 1996 में अटल बिहारी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने । 13 दिन की सरकार में अटलजी जब संसद में विश्वास प्रस्ताव पेश कर रहे थे ,अटलजी  भूल गये कि वो खुद देश के प्रधानमंत्री हैं । अटलजी ने अपने भाषण की शुरूआती संबोधन में माननीय प्रधानमंत्री के साथ शुरू किया तो पूरा संसद ठहाकों से गूंज गया। बाद में अटलजी को भी इस संबोधन का ऐहसास हुआ और वो खुद भी अपनी हंसी नहीं रोक पाये । अटलजी के जीवन से जुडी कई ऐसी यादें हैं जो आज  अटलजी के चाहने वालों के जेहन में बरबस हीं कौंध रही हैं ।वाकई अटलजी का व्यक्तित्व हमेशा याद आयेगा जिसने सियासत को एक नया आयाम दिया । 

 

 

 

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