किसानों के साथ वादाखिलाफी क्यों कर रही मोदी सरकार

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भारत के समाचार, India News


आज भी चुनौती बनी हैं स्वामीनाथ आयोग की सिफारिशें 
 

लखनऊ। अपनी उपज के  वाजिब दाम की मांग को लेकर देश का अन्नदाता पिछले कई दिनों से सड़कों पर है। उसके सामने बड़ी चुनौतियां आज भी मुंह बाए खड़ी हैं। देश के तामम हिस्सों में किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। देश का अन्नदाता आत्महत्या करने पर मजबूर है। लेकिन सरकारों को इससे क्या लेना-देना। वही मनमोहन सरकार के समय सदन में किसानो की मांग को लेकर विरोध दर्ज करनेवाली बीजेपी को 2014 में किसानों से किए गए अपने वादों को याद रखना होगा। 

बताते चलें कि ठीक बारह साल पहले यूपीए सरकार ने में स्वामीनाथ आयोग ने किसानों की हालत सुधारने के लिए कुछ अहम सिफारिशों को मंजूरी देने की मांग सरकार से की थी लेकिन तत्कालीन मनमोहन सरकार उन सिफारिशों से इतर महज कर्जमाफी तक ही सीमित दिखाई दे रही है ।

 

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उस दौरान विपक्ष में बैठी भाजपा के सांसदों ने सदन में कई बार ​स्वामीनाथन आयोग को किसान हितों के लिए लागू करने की मांग के साथ हंगामा भी किया, बावजूद इसके यूपीए सरकार किसानों और विपक्ष की लाख कोशिशों के बाद भी वह कर्जमाफी से आगे नहीं बढ़ पाई। और पिछले चार साल से सत्ता संभाल रही मोदी सरकार भी उसी के नक्शे कदम पर चलते हुए कर्जमाफी से आगे कुछ नहीं कर सकी। 

गौरतलब है कि 2014 के लोक सभा चुनाव के दौरान मोदी जी ने गुजरात के कक्ष से लेकर दिल्ली की जनसभा तक लोगों से वोट मांगते हुए मंच से कहा था कि देश में भाजपा सरकार बनने के बाद स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया जाएगा। इसके बाद  किसानों किसानों को उनकी उपज का लागत मूल्य से 50 प्रतिशत अधिक मुनाफा मिलने लगेगा। लेकिन  मोदी सरकार भी  कर्ज माफी से ज्यादा कुछ नहीं कर सकी। 

 

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अलबत्ता कैराना और नूरपुर सीट हारने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गन्ना किसानों को साधने की कोशिश करते हुए कुछ घोषणाएं की लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस पैकेज से देश का अन्नदाता खुशहाल हो जाएगा। 2014 में सरकार बनने के बाद किसानों की हालत सुधारने की बात करने वाले मोदी जी मंचों से 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात करने लगी है। 

देखा जाए तो वर्तमान साल ही किसाना आंदोलनों का साल बनता जा रहा है। 2018 के शुरू होते ही फरवरी महीने में दिल्ली, हरियाणा में किसानों ने प्रदर्शन और घेराव कर अपना हक मांगा। उसके बाद मार्च में तकरीबन 40 हजार से अधिक किसानों ने अपनी समस्याओं को लेकर महाराष्ट्र के नासिक से लेकर मुम्बई तक पैदल मार्च कर अपना हक मांगा।

वहीं मार्च मे ही हजारों किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया, और अब देश के सात से अधिक प्रदेशों में किसान अपने उत्पाद का सही मूल्य की मांग को लेकर सड़कों पर है।

वास्तव में देखा जाए तो किसानों के भीतर कर्जमाफी की चाहत जगाने का काम उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पिछले साल तब शुरू कर दी थी जब योगी आदित्यनाथ ने 36 हजार करोड़ की कर्जमाफी का फैसला किया। 

किसानों को लेकर बैंकों द्वारा कर्ज काफी से जुड़े जारी आंकड़ों पर नजर डाले तो राजस्थान के किसानों पर 82 हजार करोड़ का कर्ज है। वहीं हरियाणा में किसानों पर 56 हजार करोड़ का कर्ज है।  

महाराष्ट्र में 31 लाख किसानों पर 30 हजार करोड़ का कर्ज है। वहीं मध्य प्रदेश में किसानों पर 74 हजार करोड़ का कर्ज है जबकि उत्तर प्रदेश में  किसानों पर तकरीबन 86 हजार करोड़ का कर्ज है। देखा जाए तो देश के महज पांच राज्यों में 3 लाख 28 हजार करोड़ रुपये का कर्ज बकाया हैै। 

स्वामीनाथन आयोग की  सिफारिशों पर एक नजर


1- फसल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले।

2- किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीच कम दामों में मुहैया कराया जाए। 

3- गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए।

4- महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जरी किए जाएं।

5- किसानों के लिए कृषि  जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके।

6- सरप्लस और इस्तेमाल नहीं हो रही ज़मीन के  टुकड़ों का वितरण किया जाए। 

7- खेतीहर जमीन और वनभूमि को गैर कृषि उद्देश्यों के लिए कारपोरेट को न दिए जाएं। 

8- फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले।

9- खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था के लिए कर्ज की व्यवस्था हर गरीब और जरूरतमंद तक पहुंचे।

10- सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने वाले कर्ज दर दर सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दर कम करके चार फीसदी किया जाए।

11- कर्ज की वसूली में राहत, प्राकृतिक आपदा या संकट से जूझ रहे इलाकों में ब्याज कट से जूझ रहे इलाकों में ब्याज से राहत हालात सामान्य होने तक जारी रहे। 

12- लगातार प्राकृतिक आपदाओं की सूरत में किसानों को मदद पहुंचाने के लिए एग्रीकल्चर रिस्क फंड का गठन किया जाए। 

13- 28 फीसदी भारतीय परिवार गऱीब रेखा से नीचे रह रहे हैं। ऐसे लोगों  के लिए खाद्य सुरक्षा का  इंतज़ाम करने की सिफारिश आयोग ने की। 

 

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