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 बच्चों को गुणवत्ता परक शिक्षा दे, अंधी दौड़ का हिस्सा न बनाये 

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मेहमान की कलम से 

हिंदी- 99, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान,फाउंडेशन ऑफ आईटी -100 अंक 

दिन पर दिन  हाई स्कूल व इंटर परीक्षाओं में दिए जाने वाले नंबर, 90% से बढ़कर, साल दर साल,बढ़ते हुए 99.9% तक पहुच गए हैं, और इस बार एक बालिका को सारे सब्जेक्ट्स में 100% व एक विषय मे 1 नंबर कम आने के कारण कुल 99.9% दिए गए।

कोई ताज्जुब नही की अगले वर्ष कुल मार्क्स की प्रतिशत 100% हो जाये। दरअसल ये कुचक्र एजुकेशन माफियाओं व कुछ बाहरी लोगो की सोची समझी रणनीति है।

 

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आपने आईएएस के इम्तिहान की मार्किंग सुनी होगी 

 

टॉपर  के 50% नंबर आ जाएं तो भी बहुत बड़ी बात है और दुनिया में  जितने  भी सर्वोच्च विश्वविद्यालय हैं जिनमे मार्किंग पैटर्न यही होता है क्योंकि कोई चाहे जितनी भी पढ़ाई कर ले,वो सौ प्रतिशत का हकदार हो ही नही सकता, (कुछ अपवादों, मैथ्स को छोड़कर, हालांकि उसमे भी अब स्केलिंग की जाती है) और इससे मनोवैज्ञानिक रूप से छात्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।

पूरा समाजिक ढांचा चरमरा गया है,इस अंधी दौड़ से

बच्चो में बेवजह की प्रतिस्पर्धा के कारण तनाव व हींन भावना आ रही है और वे व उनके माता पिता, अवसाद का शिकार होकर जीवन से हारी मानकर चुपचाप बैठ जाते है, और जिनके नंबर ज्यादा आते है, वे पुदीने के पेड़ पर चढ़ जाते है और असलियत का पता उन्हें आने वाले स्पर्धा या लॉन्चिंग के वक्त लगता है जब वे खोखले साबित होते हैं। (सबने बिहार की टोपर का प्रोडिगल साइंस सुना ही होगा)

CBSE व ICSC बोर्ड्स  जानबूझ कर स्कूलो में गोरखधंधा ,व भ्रस्टाचार फैलाने के लिए, सामाजिक मापदंडों से खिलवाड़ करके, एक पैनिक फैला रहे हैं।
इस तरह स्कूलों की चूहों की दौड़ शुरू होती है जिनमे मेधावी होने की कसौटी "किसी तरह" नंबर लाना ही होती है और बच्चा व माबाप इसी दौड़ में जीवन बर्बाद कर देते हैं, चंद नंबरो की खातिर, जिनका न तो इंटेलक्ट से कोई मतलब होता है, न ही भविष्य से, बस एजुकेशन माफियाओं की जेब जरूर भर्ती है।

आज भी पुरानी जनरेशन के 90% लोगों को अपने हाई स्कूल व इंटर के नंबर याद भी नही होंगे, लेकिन ये बोर्ड व सिस्टम ऐसा झुठलावा लोगो के सामने रख देते हैं और पूरा सिस्टम व समाज इनके षड्यंत्र का शिकार बना हुआ है। 

 

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आज बच्चो में इनोवेशन खत्म हो चुका है और ज्यादातर माबाप भी अपनी अधूरी आकाक्षाओं व असफलताओं को पूरा करने के लिए बच्चो को इस दलदल में झोंककर उनका जीवन बर्बाद कर रहे है।और जो सरकार में बैठे हैं उनका विज़न तो माशाअल्ला होता ही है।

कुल मिलाकर, सिर्फ खुद को उस दौड़ का हिस्सा न बनाकर बच्चे को गुणवत्ता परक शिक्षा , देना ही एकमात्र रास्ता बचा है, लेकिन उसके लिए खुद भी वैसा ही माइंडसेट होना जरूरी है।

डॉ आर के वर्मा (देव)

 

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