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अहिंसा दिवस पर अन्नदाताओं पर हिंसा

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ओपिनियन

लखनऊ। अहिंसा दिवस पर हिंसा। यह हिंसा किसी और के साथ नही। देश के अन्नदाताओं पर आंसू गैस के गोले। बबर्रता से लाठीचार्ज। किसाना अपने हकों की मांग को लेकर आंदोलित हुए। इस पर सरकार का यह रवैया। वर्तमान समय में देश का किसान परेशान है। उसके पास घर छोड़कर हको की लड़ाई करने का समय नहीं है। बड़े और छोटे तबके के किसानों की समस्याओं में जमीन आसमान का अतंर है इसलिए दो चार राज्यों अथवा दस पांच जिले के किसानों की माँग के आधार पर पूरे देश एवं प्रदेश के किसानों के भाग्य का फैसला करना न्यायोचित नही है। किसान भी बड़े,मध्यम एवं छोटे तीन वर्गों में बंटा हुआ है।

 

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छोटे किसानों में कच्चा बीस बीघा तक के किसान आते हैं जिनमें खेतिहर मजदूर भी शामिल होते हैं। सरकार इन छोटे किसानों के विकास के लिये तरह तरह की योजनाएं लाती रहती है इसके बावजूद इस वर्ग का किसान आज भी फटेहाल परेशान रहता है और ठीक से परिवार का भरण पोषण तक नहीं कर पाता है। किसान अपनी समस्याओं को लेकर तहसील, ब्लाक जिला प्रदेश देश मुख्यालयों पर महात्मा गांधी के बताये रास्ते पर सविनय अवज्ञा आंदोलन करते रहते हैं। इस लोकतांत्रिक देश में बापू के बताये"- न मारेगें न मानेगें, बहादुर कष्ट झेलेंगे" का अनुकरण कर अपनी समस्या सरकार तक पहुंचाने और उनका समाधान कराने के लिये धरना प्रदर्शन आंदोलन करने का हक तो सभी को मिला हुआ है। दो दिन पहले महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के दिन अपनी समस्याओं को लेकर दिल्ली कूच कर रहे किसानों पर उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमा पर किये गये लाठीचार्ज को किसी भी दशा में उचित नही कहा जा सकता है।

 

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सरकार अगर उन्हें दिल्ली में नही घुसने देना चाहती थी तो उनकी न्यायोचित मांगों को घुसने से पहले ही अपना मंत्री भेजकर मान लेना चाहिए था। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि किसान के नाम पर लोगों को कानून हाथ में लेने की इजाजत नही दी जायेगी और जिन माँगों को लेकर दिल्ली जा रहे थे उनमें से अधिकांश माँगों पर सरकार पहले से ही सहानुभूति पूर्वक विचार कर रही है। अगर सरकार समय रहते किसानों की समस्याओं का निदान कर देती रहे तो शायद किसानों को अपनी समस्याओं को लेकर धरना प्रदर्शन दिल्ली लखनऊ कूच करने की नौबत ही न पैदा हो। किसान ही देश में उत्पादित होने वाले विभिन्न उत्पादों को खरीदने वाला उपभोक्ता होता है शायद इसी लिये किसान को अन्नदाता के साथ सरकार की रीढ़ माना जाता है।

 

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अन्नदाता को दुखी करने का मतलब भगवान को दुखी करना होता है क्योंकि किसान को भगवान भी कहा जाता है। किसान ही एक ऐसा होता है जो दैवीय आपदाओं एवं संक्रमण  फसलों में लगने वाली तमाम तरह की बीमारियों से त्रस्त होते हुये भी देश का पेट अन्न पैदा करके भरता है और जरूरत पड़ने पर खाने का अनाज भी बेंच देता है।इधर तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन का सीधा असर खेती किसानी पर पड़ रहा है और कहीं बाढ़ तो कहीं भुखमरी से किसान खुदकुशी तक करने लगा है। वह अपने बच्चे को इंटर तक पढ़ने के बाद नौकरी पाने वाली शिक्षा नहीं दिला पाता है और न ही बेटा बेटी की शादी ब्याह बिना खेती बेचे नहीं कर पाता है जबकि किसान के बेटे ही इस देश की एकता अखंडता के लिये सेना की वर्दी पहनकर रात दिन देश एवं सीमाओं की रक्षा करते करते शहीद भी हो रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं पड़ोसी राज्यों के किसानों में जाटों की खेप हमेशा किसान यूनियन से जुड़कर महात्मा टिकैत की अगुवाई में अपने हकों की बहुत पहले से लड़ते रहे हैं और रालोद नेता चौधरी अजीत सिंह हमेशा यूनियन के हमेशा हिमायती एवं सरंक्षक रहे हैं। यह सही है कि अब तक यूनियन के आंदोलनों का इतिहास बहुत अच्छा नहीं रहा है और अक्सर किसानों के आंदोलन में स्वार्थी तत्व अराजकता का माहौल पैदा कर देते हैं

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