जानिए क्यों काल भैरव ने काट दिया था ब्रह्मा का सिर? 

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वाराणसी। कालभैरव भगवान शंकर के रुद्र अवतार माने जाते हैं। काशी से भैरव बाबा का संबंध बहुत ही खास होने के कारण यहां का उनको कोतवाल भी कहा जाता है। 29 नवंबर को बाबा काल भैरव की जयंती है। उनका जन्म मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। मान्यता है कि जिस किसी को भी काशी में रहना है, बाबा भैरव की आज्ञा लेना होता है। बिना उनकी आज्ञा के यहां कोई नहीं रह सकता। उनकी शक्ति का जितना बखान किया जाए कम है। उन्होंने एक बार श्रृष्टि के रचयिता ब्रह्म देव का सिर काट दिया था। इस घटना से स्वर्ग लोग में हड़कंप मच गया था। ब्रह्मा जी का शीष काट देने के कारण भैरव को ब्रह्म हत्या का पाप लगा था।

 

 

विश्वनाथ काशी के राजा

 

काशी नगरी का राज भगवान विश्वनाथ को माना जाता है। वहीं, भैरव बाबा को यहां का कोतवाल कहते हैं। भगवान विश्वनाथ का दर्शन तभी सफल होता है, जब पहले ही आप बाबा भैरव का अशीर्वाद प्राप्त कर लेते हैं। उनको काशी का कोतवाल कहे जाने को लेकर अत्यंत ही मनोहर कथा का वर्णन किया गया है। मान्यता है कि एक बार भगवान विष्णु और भोले बाबा में इस बात को लेकर विवाद खड़ा हो गया कि आ​खिर बड़ा कौन है। विवाद के दौरान भगवान शंकर का ब्रह्मदेव ने अपमान कर दिया। इससे भगवान शंकर क्रोधित हो गए और काल भैरव को प्रकट किया। 

 


ब्रह्म हत्या का पाप


काल भैरव को भगवान शंकर ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए आदेश दे दिया। इसके बाद भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मदेव के सिर को धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद उनको ​ब्रह्म हत्या का पाप लग गया। इस पाप से मुक्ति के लिए भगवान शंकर ने भैरव को कहा कि वह धरती पर जाएं और प्रायश्चित करें। जब तुम्हारे हाथ से ब्रह्म देव का कटा सिर जमीन पर गिर जाए तो समझ लेना कि पाप का प्रयश्चित हो गय है। इसके बाद बाबा भैरव धरती पर कई महत्पवूर्ण कामों को करते हुए काशा पहुंचे। यहां उनके हाथ से ब्रह्मदेव का सिर जमीन पर गिर गया और वह यहीं पर स्थापित हो गए। इसके बाद ही काल भैरव काशाी का कोतवाल कहलाए।\

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