राजनैतिक हित ​के लिए नही,लोकहित के लिए है सदन

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क्यों सदन की गरिमा को भूलते जा रहे हैं माननीय ?

विशाल मिश्रा 

यूपी विधानसभा के महत्वपूर्ण बजट सत्र के दौरान जिस तरह से विपक्ष ने एक बार फिर से आपा खोया और प्रदेश के सर्वोच्च पद पर होने के बाद भी राज्यपाल के सामने अमर्यादित अचारण किया, उससे लगता है कि यह प्रथा बन गयी है कि सदन की कार्यवाही को सुचारू रुप से नहीं चलने दिया जायेगा। यह तस्वीर सिर्फ यूपी विधानसभा की ही नहीं है, बल्कि तमाम राज्यों की विधानसभाओं और देश की सबसे बड़ी पंचायत कही जाने वाली लोकसभा का भी है। 

जहां पर सरकारों को हर बार सदन से पहले विपक्ष की मान मनौव्वल करनी पड़ती है। विपक्ष सहयोग का भरोसा भी दिलाता है और उसके बाद जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरु होती है, मानो सदन रणक्षेत्र में तब्दील हो जाता है। सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? क्यों मर्यादा भूलते जा रहे हैं, राजनीतिक दल? क्या जनता की गाढ़ी कमाई को यूं ही राजनीति आरोप प्रत्यारोप में बर्बाद किया जाता रहेगा? 


ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दर्जा रखने वाले भारत का हर नागरिक प्राय: ढूंढता है, पर उसे जवाब नहीं मिलता। क्योंकि जो आज विपक्ष में है, वो कल सत्ता में होगा और जो आज सत्ता में है, वो कल विपक्ष में होगा। नुकसान तो जनता का ही होगा। 

आज जरुरत है कि जब चुनाव हो तो जनता का जेहन में ये भी सवाल हो कि अपको वोट हम देते हैं, तो आप भी उस स्थान का अपमान ना करें। जिस स्थान पर बैठने का हक आपको इसलिए दिया गया है कि वहां पर बैठकर आप जनता की समस्याओं को दूर करने की बात करें, देश को विकास और समृद्वि की ओर जाने की बात करें ना कि उसका इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक नफे नुकसान के लिए। पिछले कई दशकों से ये रीत सी चल पड़ी है कि सदन मतलब सत्ता से लड़ाई, ये गलत है। आप अपने सवालों को सालीनता और संवैधानिक तरीके से भी रख सकते हैं।


सरकार की कमियों को आप उसे नितियुक्त तरीक से भी बता सकते हैं, फिर ये हंगामा क्यों? सदन की महात्वपूर्ण कार्यवाही को बधित करके क्यों? यूपी विधानसभा में मंगलवार को राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान जिस तरह से सपा बसपा और तमाम राजनीतिक दलों के सदस्यों ने आर्मयादित आचरण किया वो वास्तव में निंदनीय है।

ये मैं इसलिए नहीं कह रहा कि सीएम ने ऐसा कहा बल्कि इसलिए कह रहा हूं कि सीएम ने जो कहा वो काफी हद तक सही और विचाारणीय है। बजट सत्र उमें सरकार जनता के हित का स्वरूप पेश करने वाली है और उसमें ही बाधा डालना मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में ही बाधा डालना है। 

आज राज्यापालों व राष्ट्रपति के लिए सदन में अपना अभिभाषण पढ़ पाना युद्ध लड़ने के समान होता जा रहा है, ये कैसा माहौल बना रहे हैं हम। देश प्रदेश की पंचायतों में जब तक स्वस्थ्य और तार्किक बहस नहीं होगी तब तक देश व प्रदेश का भला नहीं होने वाला है। सदन को लेकर राजनीति दलों को अपनी सोच और व्यवहार बदलना होगा।

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